मुहूर्त
आज का राहु काल
राहु काल दिनमान (सूर्योदय से सूर्यास्त) का वह आठवाँ भाग है जिसका स्वामी राहु है — हर दिन का एक अशुभ खंड, जिसमें परंपरा किसी भी नए कार्य की शुरुआत टालने की सलाह देती है। इसका सटीक समय आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त पर निर्भर करता है; नीचे का समय प्रतिदिन स्वतः बदलता है।
आज Mumbai में राहु काल
आपके स्थान के आधार पर Mumbai दिखाया जा रहा है। हर शहर का समय अलग होता है — नीचे की सूची से अपना शहर चुनें।
राहु काल
07:50 – 09:28
आज आगे — 07:50 से शुरू
यमगण्ड
11:06 – 12:45
यमगण्ड — दिन का यम-भाग — आज Mumbai में 11:06 से 12:45 तक है। यह दिनमान के उन्हीं आठ भागों पर अपने अलग वार-क्रम से चलता है और इसमें भी शुरुआतें — सबसे बढ़कर यात्रा — टाली जाती हैं।
गुलिक काल
14:23 – 16:02
गुलिक काल — शनि-पुत्र गुलिक (मांदी) का भाग — आज 14:23 से 16:02 तक है। शास्त्रों की मान्यता है कि गुलिक में शुरू हुआ कार्य दोहराया जाता है, इसलिए एक बार होने वाले गंभीर कृत्य इससे बाहर रखे जाते हैं।
वार अनुसार राहु काल — शास्त्रीय तालिका
06:00–18:00 के संदर्भ-दिन की तालिका: दिनमान 90-90 मिनट के आठ भागों में बँटता है और हर वार एक भाग राहु काल को देता है — साथ में यमगण्ड और गुलिक काल के भाग। वास्तविक समय आपके शहर के असली सूर्योदय-सूर्यास्त से रोज़ बदलता है — सटीक समय के लिए अपने शहर का पृष्ठ खोलें।
| वार | राहु काल | यमगण्ड | गुलिक काल |
|---|---|---|---|
| रविवार | 16:30 – 18:00 | 12:00 – 13:30 | 15:00 – 16:30 |
| सोमवार | 07:30 – 09:00 | 10:30 – 12:00 | 13:30 – 15:00 |
| मंगलवार | 15:00 – 16:30 | 09:00 – 10:30 | 12:00 – 13:30 |
| बुधवार | 12:00 – 13:30 | 07:30 – 09:00 | 10:30 – 12:00 |
| गुरुवार | 13:30 – 15:00 | 06:00 – 07:30 | 09:00 – 10:30 |
| शुक्रवार | 10:30 – 12:00 | 15:00 – 16:30 | 07:30 – 09:00 |
| शनिवार | 09:00 – 10:30 | 13:30 – 15:00 | 06:00 – 07:30 |
राहु काल क्या है?
राहु काल — जिसे राहु कालम् या राहु काळ भी लिखा जाता है — दिन का वह भाग है जिस पर छाया-ग्रह राहु (उत्तर चंद्र-पात) का अधिकार माना गया है। राहु का कोई भौतिक पिंड नहीं है, और मुहूर्त-परंपरा में उसके अधीन समय को अस्थिर माना जाता है: उस अवधि में जो कार्य शुरू होता है, उसमें वही अस्थिरता आने की धारणा है। इसीलिए यह प्रतिदिन का एक परिहार-काल है — भय का विषय नहीं; दिन की बाकी घड़ियाँ, शुभ चौघड़ियों से लेकर अभिजित मुहूर्त तक, पूरी तरह उपयोग योग्य रहती हैं। राहु काल का पालन दक्षिण भारत में सबसे कठोर है, पर पंचांग इसे पूरे भारत में छापते हैं और अधिकांश परिवार कम-से-कम यात्रा और बड़ी शुरुआतें इससे बाहर रखते हैं।
राहु काल की गणना कैसे होती है
स्थानीय सूर्योदय से सूर्यास्त तक का समय — दिनमान — लेकर उसे आठ बराबर भागों में बाँटिए। उनमें से एक भाग राहु का होता है, और कौन-सा भाग, यह केवल वार पर निर्भर करता है। चूँकि गणना स्थान के वास्तविक सूर्योदय-सूर्यास्त से बँधी है, यह कभी घड़ी का एक निश्चित समय नहीं होता: दिल्ली का शीतकालीन सोमवार और ग्रीष्म का सोमवार अलग-अलग समय देते हैं, और एक ही दिन दिल्ली और मुंबई में भी अंतर रहता है। सभी शहरों के लिए एक ही समय छापने वाली तालिका 06:00–18:00 के संदर्भ-दिन का अनुमान भर है — क्रम याद रखने के लिए उपयोगी, कार्य का समय तय करने के लिए नहीं।
तालिका के पीछे का वार-क्रम
राहु को मिलने वाला भाग एक निश्चित साप्ताहिक क्रम से चलता है: रविवार को आठवाँ, सोमवार को दूसरा, मंगलवार को सातवाँ, बुधवार को पाँचवाँ, गुरुवार को छठा, शुक्रवार को चौथा और शनिवार को तीसरा भाग। संदर्भ-दिन पर इसी से जाने-पहचाने समय निकलते हैं — सोमवार 07:30–09:00, मंगलवार 15:00–16:30, बुधवार 12:00–13:30, गुरुवार 13:30–15:00, शुक्रवार 10:30–12:00, शनिवार 09:00–10:30 और रविवार 16:30–18:00। ध्यान दीजिए कि राहु काल दिन के पहले भाग में कभी नहीं पड़ता: वह जल्दी-से-जल्दी दूसरे भाग में, यानी मध्य-प्रातः से ही शुरू हो सकता है।
राहु काल में क्या न करें — और क्या करने में कोई दोष नहीं
परंपरा नई शुरुआतों को राहु काल से बाहर रखती है: यात्रा पर निकलना, दुकान या उद्यम का आरंभ, महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, बड़ी खरीदारी, गृह-प्रवेश और मांगलिक कार्य। जो कार्य पहले से चल रहा है, उसे रोका नहीं जाता — चालू काम, दिनचर्या का दफ्तरी काम, भोजन और विश्राम पर कोई प्रतिबंध नहीं है। पूजा-पाठ भी वर्जित नहीं है; दक्षिण भारतीय परंपरा में तो इस अवधि में दुर्गा और काली की उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है। यदि कोई अत्यावश्यक कार्य राहु काल में ही शुरू करना पड़े, तो परंपरा का अपना उत्तर है — उसे न्यूनतम रखकर विधिवत् शुभारंभ खिड़की समाप्त होने पर करें।
यमगण्ड और गुलिक काल — सहोदर खंड
दिनमान के उन्हीं आठ भागों से दो और वार-क्रमी खंड निकलते हैं। यमगण्ड — यम का भाग — विशेष रूप से यात्रा और बढ़ने वाले कार्यों के लिए वर्जित है; शास्त्रीय प्रयोग इसे समाप्ति से जोड़ता है। गुलिक काल गुलिक (मांदी) का है, जो शनि की संतान माने जाते हैं: ग्रंथों की मान्यता है कि गुलिक में शुरू किया गया कार्य दोहराया जाता है, इसलिए एक बार होने वाले गंभीर कृत्य — और जो कुछ आप दोहराना न चाहें — इससे बाहर रखे जाते हैं। इस साइट के हर राहु काल शहर-पृष्ठ पर दोनों खंड मुख्य समय के साथ, उसी सूर्योदय-सूर्यास्त से गणना करके दिए जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- आज राहु काल कब है?
- यह आपके स्थान पर निर्भर करता है: यह खिड़की आपके शहर के सूर्योदय-सूर्यास्त के बीच के समय का आठवाँ भाग है, इसलिए समय शहर-शहर अलग होता है और वर्ष भर खिसकता रहता है। ऊपर का पृष्ठ पहचाने गए शहर का आज का सजीव समय दिखाता है — सटीक समय के लिए अपने शहर का पृष्ठ खोलें।
- क्या राहु काल रोज़ एक ही समय पर होता है?
- नहीं। हर वार दिनमान का अलग आठवाँ भाग राहु को देता है — सोमवार को दूसरा, रविवार को आठवाँ — और एक ही वार का घड़ी-समय भी ऋतुओं के साथ सूर्योदय-सूर्यास्त खिसकने से बदलता रहता है।
- राहु काल में क्या नहीं करना चाहिए?
- शुरुआतें टालें: यात्रा पर निकलना, नया उद्यम, बड़े हस्ताक्षर, बड़ी खरीदारी और मांगलिक कार्य। पहले से चल रहा कार्य सामान्य रूप से जारी रहता है, और पूजा-पाठ पर कोई रोक नहीं है।
- क्या राहु काल हर जगह माना जाता है?
- पालन दक्षिण भारत में सबसे दृढ़ है, जहाँ दैनिक पंचांग इसे मुख्य परिहार-काल मानते हैं; शेष भारत में भी यह व्यापक रूप से छपता है और यात्रा व शुभारंभ प्रायः इससे बाहर रखे जाते हैं। व्यवहार परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदलता है।
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शहर अनुसार राहु काल
राहु काल स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त से बँधा है, इसलिए एक ही वार हर शहर में अलग खिड़की देता है। आज का सटीक राहु काल देखने के लिए अपना शहर खोलें।
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